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मेरे अल्फाज़

अभीष्ट मुक्तक श्रृंखला

Subhashish Pal

7 कविताएं

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माँगी जो मोहब्बत की, वो भीख नहीं पाया
दिया जख्मों पे नमक तुमने, मगर मैं चीख नहीं पाया
इश्क के खेल में ऐसा, खिलाड़ी हूँ अकेला मैं
सीखकर खेल नहीं पाया,खेलकर सीख नहीं पाया

बहुत ढीले हैं वे संबंध, जो स्वारथ हेतु होते हैं
मेरे जीबन में ही ये क्यों, राहू-केतु होते हैं
राह हम ही सही मगर मंजिल कोई और है उनकी
वो हम पर से गुजरते हैं,हम उनके सेतु होते हैं

आँखों में आशाओं का लिए अम्बार बैठा हूँ
तुम्हारी यादों का बनकर के मैं स्मृतिकार बैठा हूँ
कैसे आकर सुनाऊँ तुमको मैं हाल-ए-दिल अपना
तुम सरहद पार बैठी हो,मैं सरहद पार बैठा हूँ

- हिन्दीकवि शुभाशीष पाल

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