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KUHU-KUHU

मेरे अल्फाज़

कुहूं -कुहूं

subhash yadav

122 कविताएं

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कुहूं-कुहू मधुर स्वर में
पतझड़ लिये बसंत में
कोयल गाती गीत सुरीले
मानो ग्रीष्म ऋतु के आगमन में

जब चहुदिशा लिये महक
पुष्पों की रौनक होती है
मंडराते फूलों पर भंवरे
गुंजित लिये भनक होती है

तब पुष्पित देख बाग- बगीचे
मन को खूब लुभाती हैं
देख जिसे तब रह न पाती
कोयल गीत गाती हैं

कुहूं -कुहूं कभी महुवे से
कभी कटहल की डाली से
कभी पीपल, शीशम से
कभी दूर कहीं अमराई से

स्वर उठते हैं कोयल के
अदृश्य बिन परछाईं के
छुपकर रहती जो पत्तों में
ना जाने क्यों शर्माती हैं

पर ग्रीष्म ऋतु की दुलारी
बहुत मन को भाती हैं

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