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मेरे अल्फाज़

एक गाली हूँ

Srashti Kusum

12 कविताएं

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कुदरत का अनोखा खेल हूँ

हाँ मै स्त्री-पुरुष का मेल हूँ

न लड़का हूँ न लड़की हूँ

मै तो अपने वजूद के लिए भङकी हूँ

हाँ हूँ हिजड़ा,किन्नर, छक्का ,बीच वाला

तुम भी कोई नाम दे दो, इससे भी नीच वाला

गलती नही मेरी कि मै ऐसी हूँ

कमी रखी उस भगवान ने

दुत्कार दिया इस समाज ने

त्याग दिया उस माँ ने

जिसने रखा था नौ महिने कोख मे

छोङ दिया है इस दलदल मे

दर दर भटकती हूँ

करता याद तू शुभ कामो मे

नाच गा तालियो से पेट भरती हूँ

इंसानो की बस्ती से दूर रखते हो

दुआओ के लिए मुझे बुलावा भेजते हो

हर शुभ काम मे बजती मेरी ताली

फिर क्यों हूँ मै समाज पर गाली

वाह रे समाज , तेरा अलग ताना-बाना है

तू स्वार्थ का, नायाब नमूना है

तीसरी लिंग की श्रेणी मे मिली मुझे पहचान

कह दो छक्का, उड़ा लो मजाक

नही तोड़ पाओगे मेरा अभिमान

-सृष्टि कुसुम गुप्ता (मूसानगर)




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