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मेरे अल्फाज़

अंतस की तमस

Sourabh Mishra

6 कविताएं

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क्रोध का ये अनल, न अनुनय - विनय मानेगा ।
हो गया जो प्रज्वल्लित, अब रार नयी ठानेगा ॥
निष्ठुर अट्ठहास इसका, किञ्चित न सह पाओगे
विकराल इस लपट में, जल भस्म हो जाओगे ॥

शांत हूँ, अब शांत ही तुम मुझे रहने दो ।
पीड़ा इस ह्रदय की एकांत में सहने दो ॥
व्यर्थ ही अंतर्मन की चुभन, रोग न बन जाए कहीं;
विषाद इस ह्रदय का, चुपचाप ही बहने दो ॥

नेत्र खोल प्रलयंकारी तांडव ही न मचा दूँ कहीं ।
भस्म-भूषित ये रूप मेरा, उस प्रलय है सही ॥
कभी आ जाती है बाहर, तमस जब अंतस की ।
फिर रूप कैसा वो धरे, कोई कह सकता नहीं ॥



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