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मेरे अल्फाज़

बंधा मन

sonu shastri

151 कविताएं

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ये वैराग्य में बंधा मन
शांत शीतल सा मन
सौंदर्य की कल्पना में गोते सा लगाता
अभिभूत सा ये निश्चल तन

कभी भोर सा सूर्य की किरणों में
कभी चितचोर सा संवाद में वर्णों में
यह देह का अवलोकन और मीठा सा स्वप्न
ये वैराग्य में बंधा मन
शांत शीतल सा मन

आराध्य को समर्पित और
कल्याण को अर्पित
प्रसंग से वरण तक
विवेक से हरण तक
चमकता कभी छुब्द होता
ये वैराग्य में बंधा मन
शांत शीतल सा मन

इस मन के परिणाम बनो
इस मन का परिमाण बनो
कर लो अपने वश में
ना रहो अब कशमकश में
ये वैराग्य में बंधा मन
शांत शीतल सा मन।

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