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मेरे अल्फाज़

एक भटकती राही हूँ

sonu kumari

6 कविताएं

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निकली हूँ कुछ सपने लेकर
एक भटकती राही हूँ,
कभी यहाँ तो कभी वहाँ
दर बदर राहों में फिरती हूँ
कभी गिरती कभी संभलती
अब खुद जख्मों पर मरहम लगाती हूँ
टकराकर कईं पाषाणो से
अब खुद पाषाण बन जाती हूँ
निकली हूँ कुछ सपने लेकर
एक भटकती राही हूँ।

सोचती हुँ कोई राह तो होगी
जो मेरी मंजिल को जाती होगी
बस इन्हीं उम्मीदों पर मैं,
सपनों के पुल बनाती हूँ
एक नई राह बनाती हूँ और,
आगे बढ़ती जाती हूँ
एक भटकती राही हूँ
बस आगे बढ़ती जाती हूँ।



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