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Safar

मेरे अल्फाज़

सफर

Somesh Ghoshal

5 कविताएं

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बेहतर लगता अब ये सफर है
तपती धुप में, अपनों की छाव
चला जा रहा हु , न थकते है पाँव
ये दुनिया की भीड़ में तन्हा सा मन
न जाने किधर डोलता जा रहा हु

बेहतर लगता अब ये सफर है
बीते पलो को याद करते हुए
इधर उधर राह तकते हुए
रास्तो की सलवटों को बदलते हुए
मंज़िलो की तरफ बढ़ा जा रहा हु

बेहतर लगता अब ये सफर है
मुसाफिर नए से अब मिलने लगे है
सभी के कदम साथ चलने लगे है
ये साथ भीं छूटेगा, नए मोड़ भी मिलेंगे
कचोटेगा मन फिर इन पलो को याद करके
सफर में हु बेहतर ये सोचते हुए
न जाने किधर मै बड़ा जा रहा हु

सोमेश घोषाल

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