न्याय में देरी

                
                                                             
                            चार दिन की थी जिंदगानी,
                                                                     
                            
सुनो हम पीड़ितों की कहानी।
जब सही मार अन्याय-पाप की,
हम करते रहे गुहार न्याय की।
उन्होंने न ना सुनी हमारी बीती कहानी।
सब्र का भी बाँध टूटा,
और गुजरी हमारी भी जवानी।
बची है बस अब बुढों की कहानी,
सिर्फ है अब गुस्से और अफसोस की कहानी।
क्यों नहीं होता न्याय समय पर?
क्यों घूमते अपराधी सालों तक ,
बेफ़िक्र से हो कर।। 


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8 months ago
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