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मेरे अल्फाज़

लाख़ आफतें लिपटती हैं रोज़ कदमों से

Sk Gupta

67 कविताएं

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लाख़ आफ़तें लिपटती हैं रोज़ क़दमों से
फ़िर भी तो लाचार नहीं हुआ जाता
बीमार के संग बीमार नहीं हुआ जाता

बेशुमार धब्बे हैं धूप के भी दामन पर
हम से ही गुनहगार नहीं हुआ जाता
टूटी किश्ती में सवार नहीं हुआ जाता

उम्र गुज़र गई फ़ाक़ा मस्ती में ही सारी
इससे ज्यादा ईमानदार नहीं हुआ जाता
हमसे और शर्मसार नहीं हुआ जाता

- डॉ सत्येन्द्र गुप्ता

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