नज़्म- आख़िरी दुआ

                
                                                             
                            चौदहवां दिन लगातार है
                                                                     
                            
डॉक्टरों की आँखों को पढ़ते हुए
नाउम्मीदी के पारे को चढ़ते हुए

चौदहवां दिन है आँखें बिना मास्क के
एक इंसान भी देखने को तरसती हुई,
चौदहवाँ दिन लगातार है
लाल नीली दवाएं लहू में मुसलसल उतरती हुई...

चौदहवां दिन लगातार है
जब आज़ीज़ों की आवाज़ कानों में आयी नहीं,
चौदहवां दिन लगातार है
जब किसी ने भी घर की बनी चीज़ कोई भी खाई नहीं...

चौदहवां दिन लगातार है
जब क़ज़ा बाल खोले हुए हॉस्पिटल के हर वार्ड में रक़्स करती हुई,
और भयानक हंसी ख़ौफ़ से कांपती ज़िन्दगी के क़रीब आ के हंसती हुई...

चौदहवां दिन लगातार है
दर्द से छटपटाते हुए दर्जनों लोग इस हॉस्पिटल में आते हुए,
चौदहवां दिन लगातार है
दर्जनों लोग ताबूत में हॉस्पिटल से जाते हुए...

चौदहवां दिन लगातार है
मास्क से वार्ड में झांकती
दर्जनों उन निगाहों में मेरे लिए
कोई उम्मीद, राहत भरी इक ख़बर भी नहीं,
इतने दिन जो दवाएं रगों में उतरती रहीं,
उनका मुझ पर कोई भी असर ही नहीं...

कितना दुश्वार है पास के खाली होते हुए बिस्तरों की तरफ़ देखकर सांस लेना भी यार,
मौत से भी ज़ियादा भयानक है ये मौत का इंतज़ार...

आख़िरी सांस पर
मैंने रब से दुआ की,
दुआ में मेरी काश इतना असर आ सके,
बाद मेरे यहां वेंटिलेटर पे जो शख़्स हो
लौटकर अपने घर जा सके.....

- सिराज फ़ैसल ख़ान
शाहजहांपुर, उत्तर प्रदेश


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8 months ago
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