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मेरे अल्फाज़

विरह वेदना

Shubham Raturi

4 कविताएं

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विरह- वेदना

इतनी कठु न हो,भावुक मन तुमको हेर रहा है
पल प्रति-पल क्षण,करुण कलित नित
सकल विकल उर उथल- पुथल
भर भाव,विरह मन में लेकर
बन अश्रु मेघ,तर- तर नयना
बरसत,तड़पत,गा विकल राग।।

उठ चल प्रिय ! बनकर सजग,साथ
प्रियतम् को लेकर...
क्यों मौन पड़ी गुमसुम गुपचुप !
यह मौन चीरता ह्रदय विकल
कुछ बोल कमल दल होंठों से
तू खोल चक्षु अर देख उसे
उपहास न कर इस पीड़ा का
निज कठुता का प्रतिबिंब न बन
यह कहत,वेदना सहत ह्रदय-मन
पल- पल उसको घेर रहा है,
इतनी कठु न हो,भावुक मन तुमको हेर रहा है।।

वह जान गया सब कुछ, पर
बनकर सत्य विसुध
खोयी सुध- बुध,कर मन विराट
तू वचन तोड़ मत संगिनी का
क्या याद नहीं तुमको ?
आजीवन बनूं,प्रतिरूप तुम्हारा, ले
शपथ पकड़कर हाथ फिरत,वह
याद नहीं तुमको ?
समय न बीता, जाग प्रिये !
भरकर प्रियतम् को कुमुद बाँह
वह देख गर्जना,विरह वेदना
करता, भरता भीषण विलाप, स्वर
मृत्यु द्वार को भेद रहा है,
इतनी कठु न हो,भावुक मन तुमको हेर रहा है।।

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