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Amiri Ka Dukh

मेरे अल्फाज़

बरेली की श्रावणी बता रही हैं 'अमीरी का दुख'

shraavni Saxena

5 कविताएं

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"अमीरी का दुख"

हंसेगा क्या, औरों को हंसाएगा भी क्या ?
वह जिसको है दुख ने घेरा हुआ।
दुख का कारण पूछो न तुम,
कारण न हो तो बताएगा क्या ?

मालिक ने उसे सब कुछ है दिया
पर शुक्रिया वह जतायेगा क्या ?
उसे न है गरीबी की खबर
न उसे है भुखमरी का पता
पर दुख तो वो मनाएगा सदा।
हंसेगा क्या, हंसाएगा क्या ?

वो जो धनवान होते है
वो जिनको है सिर्फ पैसे से प्रेम
इसी दुःख में जकड़े रहते है
क्यों हो न सके दूसरों से अग्रिम ?

सदा लालच की इच्छा
जिनके मन में रहती है
उनके मन मस्तिष्क में हमेशा
ईर्ष्या की भावना पलती है

वह मोल न कभी जान पाया
क्या किस्मत ने उसको बक्शा था
काश, उफ्फ, और लेकिन, ने
उसके सुख को घेरा था।
हंसेगा क्या, औरों को हंसाएगा भी क्या ? 

- श्रावणी सक्सेना (पायल), बरेली

(उपरोक्त लेखक या रचनाकार का दावा है कि ये उनकी स्वरचित कविता है।)
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