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मेरे अल्फाज़

गगरी

Shivhare Nihalchandra

71 कविताएं

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🔹गगरी 🔹
प्यासे की प्यास न बुझा पाया
गगरी के आगे समन्दर बौना हो गया
गोकुल में गोपी की गगरी का माखन
मथुरावासी कन्हैया बिना खारा हो गया
उफनती नदिया में हीर से मिलने को आतुर
गगरी का साथ रॉंझा का केवट सा सहारा हो गया
महावर रचे पॉंव नवेली दुल्हन का आगमन
चावल भरे कलश का स्पर्श पिया घर हमारा हो गया
अधजल गगरी की तरह छलकने से जिसने पार पाया
वही दुनिया में सिकन्दर की तरह सबको प्यारा हो गया
***************************************
निहाल चन्द्र शिवहरे

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