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मेरे अल्फाज़

शरद ऋतु

ShiVendra PaTel

3 कविताएं

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तरु की तृष्णा तृप्त हुई अब, टूट रहे शाखों से पत्ते।
खिले हुए हैं कुसुम काँस के, मन को मोह रहे हैं रस्ते॥

छटे हैं बादल नील गगन से, धरा पे फैली हुई चाँदनी।
त्यौहारी संगीत है अनुपम, अनुपम है ये मधुर रागिनी॥

मंत्रमुग्ध मन देख परस्पर, युगल युगल फैली खुशहाली।
कर नौका विहार रजनी में, आज प्रिये लग रही निराली॥

घुल-कर ओस की बूँदों में, अम्बर से अमृत बरस रहा।
चाँद मनोहर इतना कि, हर व्यक्ति दरस को तरस रहा॥

धान,उड़द,तिल फसलें ऐसी, खलिहानों में खनक रहीं।
सना है धूल में हर बच्चा, पग पैजनि उनके छनक रही॥

सदा अलौकिक ही होती है, हिंदुस्तानी शाम शरद की।
खुशी में शिव दे रहा बधाई, करवा-चौथ के परम व्रत की॥

-शिव

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