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मेरे अल्फाज़

स्त्री का अस्तित्व

shivam khare

39 कविताएं

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स्त्री निंदा वे कर रहे थे
त्रियाहठ पे कुढ़ रहे थे
कहें कि स्त्री कभी वैरागी नहीं हो सकती
भोग व माया की त्यागी नहीं हो सकती
पति बच्चे गहने श्रृंगार
छोटासा उसका संसार
रूप सोंदर्य का लाभ लेती
अवसर को वह भांप लेती
बस में बैठे पुरुषों को उठा दे
किसी को भी जेल पहुंचा दे
हर तरफ़ तो इनको छूट है
घर घर में करती ये लूट है
रूठ जाना फिर मनवाना
झूठी तारीफ़,नखरे दिखाना
मुस्कान व आँसू का जाल
है इनकी मज़बूत ये ढाल
हर पति और प्रेमी परेशान है
ज़ुल्मों से इनके हलाकान है
बहुत हुआ एक सज्जन बोले
क्या पुरुष हैं पूरे दूध से धुले
महिलाओं का जो आज परिमाण है
पुरुषों के ज़ुल्मों का ही परिणाम है
बच्चे पैदा करना,पति की सेवा करना
यही तो हमने उसे सिखाया है
पंख न निकल आएँ उसके
हमने ही कहाँ उसे पढ़ाया है
चहारदीवारी में क़ैद कर उसे शरीर समझा
क्या बुराई वो लाभ ले न ले है उसकी इच्छा
बनाया है गृहलक्ष्मी तो पूरी उसकी मांग करो
डरते हो उससे निडरता का न तुम स्वांग करो
उसकी कमज़ोरी ही आज हथियार बने हैं
स्त्री के आँसू और पीड़ा ही औज़ार बड़े हैं
स्त्री का अस्तित्व हम नकार नहीं सकते
उसके हिस्से का हक़ डकार नहीं सकते

शिवम् खरे
पन्ना, मध्यप्रदेश

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