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मेरे अल्फाज़

हमसे नजरें न यूँ चुराया करो।

Shivam Dubey

4 कविताएं

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हमसे नजरें न यूँ चुराया करो,मिलने के बाद मुस्कुराया करो।
ये फूल से पाँव है तुम्हारे , काटें चुभ जायेंगे
कहते है तुमसे ,यहाँ हर रोज न आया जाया करो।

हर रोज भटक जाते है हम अपनी मंज़िल से
राह चलते अपने सर से , ये रेशमी दुपट्टा न हटाया करो।

हर निगाहें रहती है अब मुझपे , थोड़ा ख़याल करो
बदनाम हो जायेंगे खामखा हम ,इतने सितम न ढाया करो।

माना की तुम अलग हो सबसे ,थोड़ा समझा करो
कही भी ,कुछ भी मत बोला करो ,थोड़ा शरमाया करो।

हमसे नजरें न यूँ चुराया करो ,मिलने के बाद मुस्कुराया करो।

- शिवम दूबे

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