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मेरे अल्फाज़

तन्हाई !

Shishir Kumar

33 कविताएं

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ज़माने को मैं कुछ अलग अंदाज़ में मिल जाया करता हूँ
शोर -सराबों की इस दुनिया में मैं खामोश मिल जाया करता हूँ

तन्हाई में अक्सर अलग इंसान से मिल जाया करता हूँ
जो मेरे अंदर है, उस इंसान से मिल जाया करता हूँ

बहुत सी शिकायत और रुस्वाइयों के साथ बातें किया करता हूँ
कभी यूँ ही मिलकर खुद से गले मिल जाया करता हूँ

थक जाता हूँ जब ज़माने के साथ दौड़ते हुए
तन्हाइयों के आगोश में आकर सफर की धूल झाड़ा करता हूँ

कामयाबी- नाकामयाबी के तराजू में तौलती है ये दुनिया
तुम से मिलकर मैं अपने सब हिसाबों से खाली हो जाया करता हूँ

- शिशिर कुमार

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