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मेरे अल्फाज़

मैं तो बस इक छोटा सा पत्थर

Shilpi Gupta

4 कविताएं

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सड़क पर पड़ता हूँ,पहाड़ों पर बसता हूँ,
कभी बन जाऊं सजावटी, कभी खाता ठोकर,
मैं तो बस इक छोटा सा पत्थर,
तराश दो तो मूरत बन जाऊं,
आस सब की पूरी कर जाऊं,
पवित्र मन से जो मुझ में झाँकू,
दूर हो जीवन मरण का चक्कर,
मैं तो बस इक छोटा सा पत्थर।
चोट खाकर उफ्फ़ नहीं करता हूँ,
लहरों के थपेड़ों को भी सहता हूँ,
धैर्य की परीक्षा देने पर ही तो
शालिग्राम बनता हूँ,
मैं तो बस इक छोटा सा पत्थर।
मंदिर भी मुझसे ही बनते,
मस्जिद में भी मैं ही लगता,
चर्च ओ'गुरुद्वारों में भी,
बंगलों और चौबारों में भी,
गरीब हो या हो अमीर,
सबका घर मुझ से ही बनता,
मैं तो बस इक छोटा सा पत्थर।
कुछ हैं, ऐसे भी जिन्हें मेरा नाम मिले,
मैं तो हूँ निर्जीव,सजीव भला ऐसा क्यों करूं,
क्यों ले मुझे हाथ में,लोग आपस में लड़ें,
कठोर ह्रदय मत बनो, प्रेम सहयोग से रहो,
नफ़रत की आंधी छोड़ दो,
दिलों के तार जोड़ लो,
हिन्दू- मुसलमान एक हैं,
न इनमे कोई भेद हैं,
दुनिया में अपना नाम करो,
"जाओ जब"सम्मान हो,
आये अकेले जग में हो,
साथ न जाएगा लाव लश्कर,
मैं तो बस इक छोटा सा पत्थर,
मैं तो बस इक छोटा सा पत्थर।।

- शिल्पी गुप्ता

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