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Mere dard ki gehrai

मेरे अल्फाज़

मेरे दर्द की गहराई

Shikha Asthana

2 कविताएं

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गुम थे उन आंखों में कितने भूले बिसरे ख्वाब पुराने
पलक उठाकर जब देखा तो वो अपने ही लगे फसाने
बेबस गुमसुम सी आंखों में आंसू की एक बूंद नहीं थी,
पुतली बनकर व्याकुल तृष्णा इसी आस में घूम रही थी,
काश अचानक मरुस्थल में दरिया कोई लगे बहाने...

झूठी एक मुस्कान लिए उन आंखो में सच्चाई थी
शायद आज हंसी भी इन हालातों से शरमाई थी
कि हाय छुपाने में सच को ही पङते कितने झूठ बनाने....

हर चाहत रह गई अनकही कोई ख्वाहिश शेष नहीं थी,
आस की फिर भी टूटी डोरी छोर उन्हीं का ढूंढ रही थी
खोजा जितना उलझे उतने थे जिन सपनों के ताने बाने....

डूबी थी यूं दर्द में इतना भूल गई वह अक्स था मेरा
मेरी अपनी ही आंखों में था टूटे ख्वाबों का डेरा
सुध बेसुध आंखों की पीङा दर्पण जैसे लगा बताने...
गुम थे उन आंखों में कितने भूले बिसरे ख्वाब पुराने...

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