आपका शहर Close
Kavya Kavya
Hindi News ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   Mere dard ki gehrai
Mere dard ki gehrai

मेरे अल्फाज़

मेरे दर्द की गहराई

Shikha Asthana

2 कविताएं

43 Views
गुम थे उन आंखों में कितने भूले बिसरे ख्वाब पुराने
पलक उठाकर जब देखा तो वो अपने ही लगे फसाने
बेबस गुमसुम सी आंखों में आंसू की एक बूंद नहीं थी,
पुतली बनकर व्याकुल तृष्णा इसी आस में घूम रही थी,
काश अचानक मरुस्थल में दरिया कोई लगे बहाने...

झूठी एक मुस्कान लिए उन आंखो में सच्चाई थी
शायद आज हंसी भी इन हालातों से शरमाई थी
कि हाय छुपाने में सच को ही पङते कितने झूठ बनाने....

हर चाहत रह गई अनकही कोई ख्वाहिश शेष नहीं थी,
आस की फिर भी टूटी डोरी छोर उन्हीं का ढूंढ रही थी
खोजा जितना उलझे उतने थे जिन सपनों के ताने बाने....

डूबी थी यूं दर्द में इतना भूल गई वह अक्स था मेरा
मेरी अपनी ही आंखों में था टूटे ख्वाबों का डेरा
सुध बेसुध आंखों की पीङा दर्पण जैसे लगा बताने...
गुम थे उन आंखों में कितने भूले बिसरे ख्वाब पुराने...

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
Comments
सर्वाधिक पढ़े गए
Top

Other Properties:

Your Story has been saved!