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मेरे अल्फाज़

मुसीबत

Shekhar Vats

1 कविता

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मुसीबत
ऐतराज है उनको मेरी खामोशी पर
वो सुनने को तैयार नहीं, मैं बोलूँ कैसे
सारे मसले मुझे सुना, वे सो जाते हैं
मेरा हाल नहीं पूछें, मैं सो लूँ कैसे
मैं बेहतर हूँ या वो? मुझसे पूछ रहे हैं
खतरे का ये मिला तराजू, तोलूँ कैसे
मेरी निगे़हबानी पर वो शक करते हैं
लगा नहीं जो दाग, उसे मैं धो लूँ कैसे
मेरा कोई नहीं रहनुमा, सिवाय मेरे
शहजा़दी की जिम्मेदारी ढो लूँ कैसे
हो बैठे ग़मगीन, मुफलिसी पर मेरी वो
अपनी बादशाहत पर मैं रो लूँ कैसे
न मैं उनको, न वो मुझको समझा पाए
उलझी गाँठ समझदारी की, खोलूँ कैसे



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