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मेरे अल्फाज़

ठहराव जिंदगी का

Sheela Bisht

7 कविताएं

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मुझे भाने लगा है ये ठहराव ज़िन्दगी का
ये खामोशियाँ अब पसंद आने लगी हैं

अब उद्वेलित नही होता मन
किसी की बात सुनकर
नही याद कब किसने दिल दुखाया मेरा
और किसने कब फायदा उठाया मेरा
बस एक खुशी सी होती है
कि चलो इसी बहाने से
किसी के काम तो आये हम

मुझे भाने लगा है ये ठहराव ज़िन्दगी का
ये खामोशियाँ अब पसंद आने लगी हैं

शुरू कर दिया है मैंने
कुछ चीजो को समय पर भी छोड़ देना
और ये समझ आने लगा है
कि बस में इंसान के सब कुछ नही होता
सच कहूं तो, बहुत सुकून है जिंदगी में अब
ठीक ही तो है
कुछ बातें उम्र ही सिखा पाती है

मुझे भाने लगा है ये ठहराव ज़िन्दगी का
ये खामोशियाँ अब पसंद आने लगी हैं

अब रोष भी शांत हो गया है मन से
ना वो ईर्ष्या ही रही ना रहा द्वेष किसी से
समय का तकाज़ा है शायद
पता नही कहां गयी हर वक्त की वो होड़
अब दूसरों के आगे बढ़ने में भी आनंद आता है
सच कहूँ तो
जीने में रस तो अब आ रहा है

मुझे भाने लगा है ये ठहराव ज़िन्दगी का
ये खामोशियाँ अब पसंद आने लगी हैं

जवानी की वो चंचलता अब लगती है नादानी
वो छोटी सी बात पर खुश होना और
उससे भी छोटी बात पर रो पड़ना
हर सवाल का होना जवाब और
हर जवाब पर शंका में पड़ जाना
जाने कब वो समय गुजर गया
चलो जाने दो
उस उम्र का वही तो मज़ा था

मुझे भाने लगा है ये ठहराव ज़िन्दगी का
ये खामोशियाँ अब पसंद आने लगी हैं

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