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मेरे अल्फाज़

मुक़तक- क़िस्मत-ए-इश्क़

Shayar TK

2 कविताएं

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मुक़तक *क़िस्मत-ए-इश्क़*

1-

ख़्वाहिश-ए-वफ़ा के बादल कभी धरा पर बरसते क्यों नहीं,

मोहब्बत से बड़ी कोई दौलत नहीं लोग ये समझते क्यों नहीं


2-


मेरी तन्हाई के बादल इस दिल की धरा पर कुछ इस क़दर बरसने लगे हैं,

कभी बहुत बात होती थी जिनसे अब हम उनकी आवाज़ को तरसने लगे हैं ।


3-


बहुत थकन है इस ज़िन्दगी में चलो हम कुछ पल सुकूँ से सो जाएँ,

तुम हमारी मोहब्बत में खो जाओ हम तुम्हारी मोहब्बत में खो जाएँ ।


4-


दिल में है दर्द आँखों में चुभन है सोने में ज़रा वक़्त लगेगा,

ज़िन्दगी को पहले जैसी ज़िन्दगी होने में ज़रा वक़्त लगेगा ।


5-


देखो आज फिर से वही वक़्त जाने कितने दिनों बाद आ गये,

आसमान में चाँद का एक टुकड़ा देखा कि तुम याद आ गये ।


6-


सनम आख़िर जिस चीज़ का डर था हमें वही हुआ है,

ये ज़ुदाई यूँ ही तो नहीं ज़रूर टूटे ग़ुलाबों की बद्दुआ है ।


7-


भूल बैठा है दिल मोहब्बत की कैसे हम शुरुआत करें,

तुमको देखें की तुम्हें सीने से लगाएँ की तुमसे बात करें ।


8-


मिट गये यादों के वो निशान जो उनके थे,

तूफां ने बिखेर दिया अरमान जो उनके थे,

कैसे बनेगा फ़िर से यादों का आशियाना,

प्यार से चहकते थे वो मकान जो उनके थे


9-


ये दिल बेक़रार करके भी हम को,

हमें उसका प्यार मयस्सर न हुआ,

सफ़र में ही गुज़री तमाम उम्र मेरी,

मेरे दिल का कभी कोई घर न हुआ


10-


कैसे करें यकीं किसी की मोहब्बत का,

इश्क़ में वो भी कभी कमाल करता था,

आज जिसको फ़िक्र तक नहीं रही मेरी,

कल वही यादों में आँखें लाल करता था


11-


बहुत ख़ुश है वो शख़्स मेरी दिली मोहब्बत की हार पर,

सुना है चादर चढ़ाया है उसने आज मौला के मज़ार पर


12-


ग़र तुम न मिले तो भी शायद ज़ी लेंगे हम ये ज़िन्दगी तुम्हें याद कर कर के,

न दिल में कोई चाहत न होगी तमन्ना कोई, जीयेंगे तो ज़रूर मगर मर मर के


13-


कहीं कोई घर नहीं है मेरा मैं यादों के शहर में रहता हूँ,

कभी महसूस करके तो देखो मैं तुम्हारे जिगर में रहता हूँ


14-


मोहब्बत हो कर भी उनसे अब पहले जैसी मोहब्बत न रही,

जबसे बोला है उसने झूठ मुझसे चाहत में वो शिद्दत न रही



✍ *शायर Tk Singh, आजमगढ़, उत्तर प्रदेश* 7071546070



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