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मेरे अल्फाज़

अनुभूति के बीच

Sharmila Kumari

45 कविताएं

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अनुभूति के बीच.
सूरज डूब रहा है
डूब रहा है उगने के लिये
कल का सूरज नहीं होगा वही जो है आज
कल और आज क्या है अन्तराल मात्र...
कि सूरज ने बनाया जो चक्का
उर्जा को पदार्थ में बदल
उस नौ तरह की गतियोंवाले चक्र का अर
छवि सतरंगी
सृजन और क्षय का बदलाब
भीतर के बदलते परिपेक्ष्य
क्या ठहरा जा सकता है यहाँ
सागर के द्वन्द के बीच
सूरज डूब रहा है सागर के उसपार जैसे
धरती और सागर के बीच खड़ी हूँ मैं .
प्रकाश जा रहा है
आ रहा है अंधकार
प्रक्रिया और परिवर्तन...
विचार की भी होती है अलग-अलग दिशायें
स्पष्ट और अस्पष्ट...
क्या हम हरक्षण अज्ञात से ज्ञात में बढ़ते हैं
अपने से दूर बहुत कुछ छोड़ देते हुए
असंख्य सूरज को ओझल छोड़ देते हुए
मेरे भीतर की लहरें पूरी शक्ति से उठ रही है
जैसे सागर समेटना चाहता है सूरज को
जैसे पृथ्वी पाना चाहती है सूरज को
लब्धि और इच्छाऐं
गतिशीलता के बीच ठहरा जा सकता है
उगती अनुभूति के बीच
विमुग्ध मैं देखती
स्वर्णिम क्षितिज पर थके उँघते सूरज को
लौटते हुए

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