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मेरे अल्फाज़

ज़िंदगी न खेल समझो न हिरासत समझो

Shanti Swaroop

921 कविताएं

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ज़िंदगी न खेल समझो न हिरासत समझो !
ये तो एक क़यामत है बस क़यामत समझो !

जाने कब शुरू हो जाएँ ज़माने की साजिशें,
अब मुस्करा दे गर कोई तो गनीमत समझो !

अब तो आंसुओं की तासीर में न रहा वो दम,
न दुखता है दिल किसी का हक़ीक़त समझो !

बदल चुका है बहुत इस दुनिया का मिज़ाज़ ,
बीते ख़ैरियत से दिन तो बस इनायत समझो !

दौलत की हवस में बन गया शैतान आदमी,
दिखा दे रहम अगर कोई तो शराफ़त समझो !

आदमी बदलता है हर रोज़ नए मुखौटे "मिश्र",
कोई दिखाए सब्ज़ बाग़ तो सियासत समझो !

शांती स्वरूप मिश्र


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