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मेरे अल्फाज़

इज़्ज़त हलाल क्या करना

Shanti Swaroop

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न हो जिसका जवाब, तो ऐसा सवाल क्या करना 
नहीं है जो मुकद्दर में, उसका मलाल क्या करना 

जब वक़्त था तो करते रहे हम नफरतों की खेती,
जब सरका वक़्त हाथों से, तब कमाल क्या करना !

बस जीते रहे अपने लिए न समझा दर्द औरों का,
फूल ही मुरझा गए, तो डालों से सवाल क्या करना !

न दिखता अगर महफ़िल में अपने वजूद का असर,
तो ठहर के उस जगह पे, इज़्ज़त हलाल क्या करना !

ज़िन्दगी तो उलझ गयी इस दुनियां के ताने वाने में,
जब टूटे पड़े हों रिश्ते, तो अपना ख़याल क्या करना !

"मिश्र" शराफ़त का दुनिया में ग्राहक नहीं कोई भी,
जब अँधेरे रास आते हों, तो रोशनी बहाल क्या करना !

- शांती स्वरूप मिश्र

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