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मेरे अल्फाज़

धुआँ बन गया हूँ मैं

Shanti Swaroop

921 कविताएं

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आग था कल तलक, अब धुआँ बन गया हूँ मैं
जलते जलते रात भर, अब तो बुझ गया हूँ मैं

फ़िराक़ में था उड़ने की मगर पर कतर डाले,
अब तो बुलंदियों के नाम से ही, डर गया हूँ मैं

गुज़रे हादसों का ख़ौफ अब भी डराता है मुझे,
अब तो सुन सुन के वही आहटें, थक गया हूँ मैं

लोगों ने बना डालीं हैं अब मोहब्बतों से दूरियां,
अब तो नफरतों के जंजाल में, फंस गया हूँ मैं

दिल अपनों के तमाशों से कुछ बेचैन है "मिश्र",
अब तो अंधेरों के झुरमुट में, छिप गया हूँ मैं

शांती स्वरूप मिश्र


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