आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   aadami darinde ho gaye

मेरे अल्फाज़

आदमी दरिंदे हो गए

Shanti Swaroop

1109 कविताएं

21 Views
दिखते हैं आदमी से मगर, वो दरिंदे हो गए
शौहरत पाने की ललक में, वो अंधे हो गए

न दिखती है सिसकती हुई इंसानियत उन्हें,
यारो सोहबतों के असर में, वो दुरंगे हो गए

अब वो खरीदने लगे हैं मजबूरियाँ लोगों की,
जितने थे नेक दिल, उतने ही कुढंगे हो गए

अपने कर्मों को आखिर छुपायेंगे कब तलक,
मुखौटों में रह कर भी यारो, वो नंगे हो गए

पनपने लगा है हर तरफ नफरतों का जंगल,
अब मोहब्बतों के भाव भी, बेहद मन्दे हो गए

जाने बदला है मिज़ाज़ कैसा ज़माने का "मिश्र",
अब तो ईमानो धरम, बिकने के धंधे हो गए

- शांती स्वरूप मिश्र

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!