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मेरे अल्फाज़

रोने दे कान्धे पर सर रखकर

SHANKAR lal

6 कविताएं

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रोने दे कांधे पे सर रखकर मुद्त से अंखियों की उदास बाकी है
पीने दे हुस्न ए शबाब सदियों से लवों की प्यास बाकी है

आज तो सागर को अपने हाथों से ज़ाम बनाकर पिला दे साकी
अभी तो जिदंगी की मेरी एक गम ए शाम बाकी है
एक वक्त गुजर गया तेरे दीदार ए आरजू में खा़मोश रोते रोते
ना सर हटा श़ानों से अभी कयामत तक का हिसाब बाकी है
यूं तो प्यार में तेरे बदनाम हो चुका हूं बेसबब मैं कई बार
ना रोक गले लगने से अपने अभी तो कई इल्जाम बाकी है
जमाना बन गया है दुश्मन उल्फत की चाहत का अब तो
ना बोल कुछ अभी नफरतों का इंतकाम अभी बाकी है
आखरी शाम है महफिल में आज तेरे मेरे इम्तहान की
कौन जाने कल तेरी मेरी मोहब्बत का क्या होना अंजाम अभी बाकी है

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