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मेरे अल्फाज़

रफू कर पाने में.....

SHANKAR lal

90 कविताएं

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रफू कर पाने में.......

जिंदगी गुज़र जाती है एक छोटा सा आशिया बनाने में
कोई एक पल भी नहीं सोचता किसी का घर जलाने में

कितनी ही जिन्दा साँसे टूट जाती है आगों की गरम लपटे बुझाने में
धडकते दिल भी बुत बन जाते हैं देखकर मंजर इस गम के पैमाने मे

ए दोस्त क्यों मजहबी लडाई में इंसानियत तलाश करते हो
उम्र तमाम गुजर जायेगी टूटे दिलों को फिर रफू कर पाने में

जख्म जो गहरे दिल को दे रहे हो खूद भी कबूल कर पाओगे क्या
बिखर जायेगी जिंदगी यू ही तमाम आंसुओं को संभाल पाने में

नफरत के दरवाजे बन्द कर दो मौहब्बत की खिड़की से हवा आने दो
बेवफाई को वफा बना दूँ आ गले लग जा वक्त लगता नहीं मौसम बदल जाने में

-----शंकर बुलंदशहरी
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