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मेरे अल्फाज़

कुर्सी को बाजारू क्यों बनाया जा रहा है....

SHANKAR lal

94 कविताएं

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शंकर बुलंदशहरी की कलम से एक ग़ज़ल...

शांत वतन के सीने मैं आग का तूफान क्यों उठाया जा रहा है
सत्ता के लिए इंसान से इंसान को क्यों लडाया जा रहा है

खिलते रहतें हैं जिस चमन में मोहब्बत के गुल हर शाख पर
उसी गुलिस्ता को सियासत की तलवार से पतझड़ क्यों बनाया जा रहा है

जलती रहती है इंसानी इबादत, एकता की मसाल जिस वतन में हर वक्त
उसी वतन की इंसानियत को नफरत की चिंगारी से क्यों जलाया जा रहा है

राजनीति की खातिर बस,घर कर गई जेहन में फसाद की चाहत
तुलसी के आंगन में बबूल का दरख़्त क्यों लगाया जा रहा है

भटकी भटकी नजरें खोज रही है इंसानियत आज हैवानों की भीड़ में
राजनीति बदनाम कर कुर्सी को बाजारू क्यों बनाया जा रहा



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