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मेरे अल्फाज़

मुखौटे

shambhavi Mishra

1 कविता

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आखिर इतने मुखौटे कहाँ से लाते हो तुम?
हर रोज एक नया मुखौटा लगाते हो तुम
इन्हीं मुखौटों के सहारे
कभी गहरे दुश्मन तो कभी दोस्त नजर आते हो तुम
रंग – बिरंगे, सुंदर डरावने, प्यारे – लुभावने
अनगिनत मुखौटों के पीछे ख़ुद को छुपाते हो तुम।
आखिर इतने मुखौटे कहाँ से लाते हो तुम।
हाँ, शायद स्वरूप बदल गया है रावण का कलयुग में,
अब प्रत्यक्ष दिखाई नहीं पड़ते दस शीश उसके,
वरन् छिपे रहते हैं पीछे एक दूसरे के
जिनको बदलते रहते हो तुम।
कुछ भी प्रत्यक्ष नहीं करते हो तुम,
रावण होते हुए भी राम का मुखौटा पहनते हो तुम।
बस इसी तरह लोगों को लुभाते हो तुम।
आखिर इतने मुखौटे कहाँ से लाते हो तुम?
अरे, बस भी करो कलयुग के रावण,
क्यूँ अपना परलोक बिगाड़ते हो तुम।
ये कलयुग है, हैं कई रावण घूमते यहाँ,
आज तुम हो लोगों को भरमाते,
कल कोई दूजा रावण भरमा देगा तुम्हें
लगाकर इन्ही में से कोई मुखौटा तुम्हारे जैसा।
फिर शायद प्रश्न यही करोगे तुम,
आखिर इतने मुखौटे कहाँ से लाते हो तुम?
– शाम्भवी शिवओम मिश्रा

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