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Maa

मेरे अल्फाज़

मां...

shalini mukhraiya

2 कविताएं

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जग में किसने देखा ईश्वर को
आँखेँ खोली तो पाया तुझको
मुझको ला कर इस सँसार मेँ
“माँ” मुझपर तुमने उपकार किया
मुझे अपने रक्त से सीँचा तुमने
मुझे सांसोँ का उपहार दिया
मेरे इस माटी के तन को
माँ तुमने ही आकार दिया
कैसे यह कर्ज़ चुकाऊँ मैँ
इतना तो बता दे “राम” मेरे
पहले “माँ” का कर्ज़ चुका लूँ
फिर आऊँ मैँ द्वारे तेरे

मेरी हर इच्छा को तुमने
बिन बोले बोले ही पहचान लिया
सुख की नीँद मैँ सो पाऊँ
अपनी रातोँ को भुला दिया
मेरे गीले बिस्तर को माँ तुमने
अपने आँचल से सुखा दिया
गर डिगा कहीँ विश्वास मेरा
मुझे हौसला तुमने दिया
मुझे हर कठिनाइयोँ से
टकराने का साहस तुमने दिया

मेरी छोटी – बडी सभी नादानियोँ को
तुमने हंसते हंसते बिसरा दिया
मेरे लड्खडाते कदमोँ को माँ तुमने
अपनी उंगली से थाम लिया
तेरे इस बुढापे मेँ माँ तेरी
लाठी मैँ बन जाऊँ
मुझको सहारा दिया था कभी तूने
तेरा सहारा मैँ बन जाऊँ हर दम
फिर भी न अहसान चुका पाऊँ
चाहेँ ले लूँ मैँ कितने जनम

इस धरती पर “माँ”
ईश्वर का ही रूप है
कितने बदनसीब होते हैँ वे
जो ढूंढ्ते है ईश्वर तुझको
मन्दिर , मस्जिद , गुरुद्वारोँ मेँ
अपने घर मेँ झाँक तो लेँ
वह मिलेगा तुझे माँ की छाँव मेँ

ना जानू मैँ काबा तीरथ
ना जानू हरिद्वारे
ना जानूँ मैँ काशी , मथुरा
ना ही तीरथ सारे
मैँ तो जानू “माँ” बस तुझको
सारे तीरथ बस तेरे ही द्वारे

शालिनी मुखरैया
अलीगढ़

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