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Mother's day

मेरे अल्फाज़

जननी गयी हैं मुझसे रूठ

Shalini Kaushik Advocate

18 कविताएं

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वो चेहरा जो
शक्ति था मेरी ,
वो आवाज़ जो
थी भरती ऊर्जा मुझमें ,
वो ऊँगली जो
बढ़ी थी थाम आगे मैं ,

वो कदम जो
साथ रहते थे हरदम,
वो आँखें जो
दिखाती रोशनी मुझको ,
वो चेहरा
ख़ुशी में मेरी हँसता था ,
वो चेहरा
दुखों में मेरे रोता था ,
वो आवाज़
सही बातें ही बतलाती ,
वो आवाज़
गलत करने पर धमकाती ,

वो ऊँगली
बढाती कर्तव्य-पथ पर ,
वो ऊँगली
भटकने से थी बचाती ,
वो कदम
निष्कंटक राह बनाते ,
वो कदम
साथ मेरे बढ़ते जाते ,
वो आँखें
सदा थी नेह बरसाती ,
वो आँखें
सदा हित ही मेरा चाहती ,
मेरे जीवन के हर पहलू
संवारें जिसने बढ़ चढ़कर ,
चुनौती झेलने का गुर
सिखाया उससे खुद लड़कर ,
संभलना जीवन में हरदम
उन्होंने मुझको सिखलाया ,
सभी के काम तुम आना
मदद कर खुद था दिखलाया ,

वो मेरे सुख थे जो सारे
सभी से नाता गया है छूट ,
वो मेरी बगिया की माली
जननी गयी हैं मुझसे रूठ ,
गुणों की खान माँ को मैं
भला कैसे दूं श्रद्धांजली ,
ह्रदय की वेदना में बंध
कलम आगे न अब चली .

शालिनी कौशिक कौशल

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