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मेरे अल्फाज़

मैं भी बहुत आगे निकलना चाहती हूँ...

Shail tiwari

16 कविताएं

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मैं भी बहुत आगे निकलना चाहती हूँ,
गैरों से नहीं खुद संभालना चाहती हूँ।
तय किये हैं रास्ते खुद भी मैंने यहाँ,
फ़ैसला अब नहीं बदलना चाहती हूँ।।

है मेहनतों का खज़ाना बहुत पास मेरे,
पर इन पर भी छाए रहते हैं बादल घनेरे,
मैं भी अब खुद पँखों से उड़ना चाहती हूँ,
जीवन में बहुत आगे निकलना चाहती हूँ।

है कोई जो मेरी मंज़िल की राह दिखा दे?
बहुत भटक रहा हूँ कोई उसका पता बता दे!
मैं भी क़रीब मंज़िल के पहुंचना चाहती हूँ,
जीवन में बहुत आगे निकलना चाहती हूँ।

एक डगर दिख रही है मुझे दूर कहीं,
नज़र मेरी भी जाकर ठहर गई है वहीं।
उसको भी अब रूह में ढालना चाहती हूँ,
जीवन में बहुत आगे निकलना चाहती हूँ।

- शैलेन्द्री तिवारी "शैल"

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