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मेरे अल्फाज़

खुलते हुए जुल्फों से महक बना

Shaikh Aalam

27 कविताएं

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खुलते हुए जुल्फों से महक बना,
गीली मुस्कान से चहक बना,
बा-वजू है इश्क़ की अदा यहां,
इस तरह से यार ख्याल चमक बना,

मुर्दा के लिए हलाल क्या जुबां होगा,
मजहब-ए-इश्क़ तू यहां ऐसी दहक बना ,

घातक साबित होगा यह फैसला तो ,
रुकती कथाओं के लिए कोई सबक बना,
नादानियों का सुरंग इस्तेमाल क्यों नहीं,
इन निशानियों मंजिलें सड़क बना ,
जुदाई से बावस्तगी देगी विसाले- यार,
फुर्सत मिले कभी तन्हाई की तो खनक बना !

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