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Asmanjas mei.......

मेरे अल्फाज़

असमंजस

Shahneel Khan

49 कविताएं

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ये दुनिया, ये समाज,
ये रीति और रिवाज |
ये 'धर्म' संकट,
और जात-पात की गाज ||

कब बदलेगा ये समाज, कब बदलेगा ये जहान |
असमंजस में जी रहा है, आज का इंसान ||

सोच है बीमार वाली,
मुंह में हमेशा रहती गाली |
कैसे जीनी है जिन्दगी?
कहते हैं कट जायेगी साली ||

अज्ञानता का भाषण दे के बनते हैं सुजान |
असमंजस में जी रहा है, आज का इंसान ||

न किसी का दर्द समझे,
न किसी का दुःख समझे |
देखके हर किसी के गम को,
वो अपना सुख समझे ||

क्यों खुश होता है वो, जब जाती है किसी की जान?
असमंजस में जी रहा है, आज का इंसान ||

न कोई मकसद है, न कोई ऐम है |
अब तो ये ज़िन्दगी जैसे कोई गेम है ||
करनी होती है खुद की, होता किसी पे ब्लेम है |||

बुरे उपायों का रास्ता क्यों होता है आसान ?
असमंजस में जी रहा है, आज का इंसान ||

न किसी का सम्मान करे,
न किसी का एहतराम करे |
अहम की धुन में रहता है,
न किसी को सलाम करे ||

अपने मुंह मियां मिठ्ठू बनके करता है गुणगान |
असमंजस में जी रहा है, आज का इंसान ||

ये रंग भेदी हमले,
ये नस्ल भेदी हमले |
क्यों कसे जाते हैं ?
धर्म-जात पर जुमले ||

ऐसे में किसी भी देश का नहीं होगा उत्थान |
असमंजस में जी रहा है, आज का इंसान ||

राजनीति इंसान से इंसानियत छीन लेती है,
सामाजिक बुराई उसकी मासूमियत छीन लेती है |
इंसान कितना भी महान काम क्यों न कर दे?
सिर्फ एक गलत काम उसकी एहमियत छीन लेती है|

अब वो जमाने लद गये जब पैदा होते थे लोग महान|
असमंजस में जी रहा है, आज का इंसान ||

- नूरहसन उर्फ शाहनील खान 


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