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मेरे अल्फाज़

वो नास्तिक था साहब

shafaque rauf

122 कविताएं

571 Views
ठंड में वो ठिठुरता वो ज़ईफ
लाग़र
चाय की दुकान पर बरतन
माँझता
एक नासमझ बच्चा
आज फिर मुझ से पूछता है
मज़हब को लेकर वतन में
फिर फसाद हुए हैं क्या साहब
हम मुखतलिफ मज़हब के लोग हैं
बरसों एक परिवार की तरह रहे साहब
पर जब भी मज़हब को लेकर वतन में बात होती है

हमारे बीच के फासले बढ़ने लगते हैं
मज़हबों में नफरत को बोया जाता है
पानी की तरह फैलाया जाता है
मैं ने तो गीता ,वेद
,क़ुरान नहीं पढ़ा साहब
क्या पढ़ता
जो पढ़कर भी अनपढ़
रहता
किसी को गले लगाने से
डरता
किसी के आँसू पोंछने से
काँपता
एक एहतजा़ज के दौरान
कोई लाश मिली

लोग बहस कर रहे थे
क्या करें?
जाने किसके डंडे से मरा है ये
हिंदु? था या मुस्लिम ?
जाने ये ज़ईफ क्या कर रहा था यहाँ?
लड़ाई करने आया या रोकने आया था ?
इसे जलाए या दफ़न करें
ये उसी लाग़र की लाश थी
घर, परिवार का पता नहीं
भीड़ को चीरता हुआ
एक नाबालिग अंदर घुसा
वो चाय की दुकान वाला
बच्चा था
बोला
"ये नास्तिक था साहब"

लाग़र-कमजोर
मुखतलिफ -अलग
एहतजा़ज -विरोध प्रदर्शन

-डा. शफ़क़ रऊफ
अररिया (बिहार)


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