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मेरे अल्फाज़

उनके नाम वो आख़िरी नज़्म

shafaque rauf

122 कविताएं

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ख़्वाहिशें उनकी बाहों में मरने की लिए
फ़साद में वो बेवक्त मारे जाऐंगे ....
होशवालों करीब जाकर देखना....
उनकी आंखें खुली होंगी
आरज़ूऐं होगें खलाओं की भी उनकी
उसने भी रात ख़्वाबों की सजाई होगी
प्यार से किसी अपने को पुकारा होगा
मौत जब सामने नज़र आई होगी
इक ख़ुदा तक उसकी आवाज़ पहुंचने से पहले
दूसरे ख़ुदा के सिपहसालार ने आकर
तीर, खंज़र ओ आतिश पे उसे चढ़ा दी होगी
ख़ुदा तो अपना भी ..
उसका भी था इश्क़ में मशगूल
उसे मेरे ख़ुदा से ..तेरे ख़ुदा से ..गर शिकायत होती
तो लहू उसने भी फलक से बरसाई होती
ये सियासत है जिसे रास्ता नहीं मालूम
सीढ़ियां दुश्वारियों के चढ़े ही बगैर
जिसने मंजिल पे नजरें टिकाई होगी
वो जो सियासत कर रहा गर मोहब्बत नहीं कर पाऐगा
और मोहब्बत की गर तो सियासत ही चला जाएगा
रास्ते का सफर तय किये बगैर
जो मंजिल तक पहुंच जाएगा
उसे न राम न खुदा ही मिल पाएगा
अंधेरा इस तरह से दिल में जो घर कर जाएगा
रोशनी में भी नज़र तैरगी ही आएगा
यह रोशनी उनके दिल की बुझने से पहले
यह उनके नाम उसकी आखरी नज्म होगी
मैं सुकून में हूं उसे बेसकूं कर कर
मेरे महबूब तू फिक्र न कर!!!

डा. शफ़क़ रऊफ
अररिया (बिहार)


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