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मेरे अल्फाज़

मिट गए जब चाहा इश्क में नाम हो....

shafaque rauf

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न मिलन की न मिलने की कोई बात हो
अब मोहब्बत से आगे भी इक रात हो


मोहब्बत तो खुदा के हर शय में है निहां
फिर क्यों इक दिल टूटने पे ही बरसात हो

क्यों लहरों को रेतों का ही साहिल मिले
ज़रूरी नहीं जो उस फसाने को क्यों परवाज हो

मुमकिन नहीं कि अब मैं वहम ओढ़ लूँ
कलेज़ा बाँध ली कि हकीकत से मुलाकात हो

फलसफा रख दी है मैंने सब ताक पे
जो थी आगाज उम्दा जरुरी नहीं हँसी अंजाम हो

अब क्यों ज़ेहन उस पे मैं बीमार करूँ
कई फ़र्ज बाकी हैं जिससे दिल को आराम हो

जो इश्क में ही सूकूँ का गर एहसास हों
फिर जहाँ में क्यों इतने सारे भला काम हो


कभी थे आदमी वो भी बड़े काम के
पर मिट गए जब चाहा इश्क में नाम हो


-डा. शफ़क़ रऊफ
अररिया (बिहार)


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