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मेरे अल्फाज़

खुश्की सहरा ओ शहर का खूब आब आब हो गया

shafaque rauf

123 कविताएं

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दरम्याँ दीवारों के ये चर्चा अब आम हो गया
लोमड़ी खरगोश जो बना रीछ बेलिबास हो गया

मुनतकी गुफ्तगू निकहत ए बर्बाद सी जो हुई
बेमतलब की बातें सभी उनका पयाम हो गया

नफ़रत के सौदागरों को हो वास्ता वतन से क्या
जो था वतन का लाल वो खाक़ के नाम हो गया

कोई लफ्फाज तिफ़्ल समझ हमें बहलाता है
खामोश आँखों का कहा अब मेरा क़लाम हो गया

हवादिश में बुझते चरागों की फिक्र कौन करे
सहरा में मामूली था आदमी वो खुद सवाल हो गया

निकलेगा चट्टानों से अब आतिशफशाँ साहब
खुश्की सहरा- ओ- शहर का खूब आब आब हो गया

ए हवा आजाद फिरने के क़बल रंग ओ ज़ात देख ले
सब खाक़ ही हुए !!मसान तो कहीं कब्रिस्तान हो गया

*मुनतकी गुफ्तगू -तार्किक बातें
निकहत ए बर्बाद -विनाशकारी हवा
पयाम -संदेश
खाक -मिट्टी
लफ्फाज-वाचाल
हवादिश -दुर्घटनाएँ
सहरा ओ शहर -जंगल व शहर
आतिशफशाँ -ज्वालामुखी


*डा. शफ़क़ रऊफ
अररिया (बिहार)


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