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मेरे अल्फाज़

जो बूढ़ी आँखें दुखती हैं

shafaque rauf

17 कविताएं

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फिर आँखों से गुज़रा वो किताबी शहर
चौराहे के दक्षिण जिसके वो लम्बी सड़क
सड़क के किनारे बैठा नब्बे वर्ष का
इक प्रौढ़ प्रतनु मोची
सरल स्वभाव जैसे हो कोई योगी,,,
इक अदम्य क्षमता है उसके पाणि में
दृढ़ निश्चय है कि विजय होगा कर्मभूमि में
काले हीरे सा डिब्बे में पालिश है
सुरभि सा विस्तर वो हिर्दय है
गुजरती उस पथ से मैं जितनी बार
देखती नहीं थकी दो बूढ़ी आँखें तन्मय है
सिलता है जब जब वो जूते को
लगता सिल रहा जर्जर होती आयु को

जो बूढ़ी आँखें दुखती है
उन अनंत पीड़ाओं की जिगीषा पर
फिर सहजता से दस रुपये मांगने
वो जब नयन उठाता है
तो सुशोभित लगता है बहुत
उसके आँखों का स्वाभिमान
वो शमित चुपके से मुस्काता है
पैसे रख पुन: अपनी दुनिया में खो जाता है

एकदिन टूट जाते हैं फिर से जूते
और नियति की अराल सृति
पहुँचा देती है मुझे उसतक
मैं हर्षित उसका अभिवादन करती हूँ
अकालपीड़ित जीवन का अवलोकन करती हूँ
बाँट लेना चाहती हूँ मैं
पीड़ा उन दुखती आँखों का
और नयन झुक जाते मेरे
उसके विक्षत जीर्णावस्था पे
मैं रख देती सौ रुपये उसके हाथों में
उसकी आँखें अग्निपिंड सी लाल हुवी
तो अनायास मुझे आभास हुआ
उसके स्वाभिमान पे किया है प्रहार
और बोल पड़ी मैं अकस्मात्
बाबा इन बूढ़ी आँखों का है पारिश्रमिक अमोल
पर मैं अकिंचन,रख लिजिये हैं ये थोड़े से केवल
फिर रेत के टीलों से स्नेह की दो बूँद बरसी
हाथों में मेरे दुआ बनकर

ऐसे मरुस्थल से गुजरते हैं कईबार नयन
कि आज भी सड़क पे खड़ा है कोई बूढ़ा सज़र
देर तलक जागी है ये आँखें
पहुँचा आएं इन्हें आशियाने तक!!!

डा.शफ़क़ रऊफ
अररिया (बिहार)




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