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मेरे अल्फाज़

हक़ीकत है जो वो ही ख्वाब लगे

shafaque rauf

122 कविताएं

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उल्फत के हाथ फिरे तो मरहम सा आराम करे
तन्हा अब कोई ज़ख़्म भी मुझे आसमान लगे

तस्ववुर के गोशों में इश्क रहे ये ख्याल अच्छा
साथ चलने को हो कोई तो सफर आसान लगे

मेरी मुस्कान पे कुर्बान और मुझे ही यूं भूल जाना
पहली बारिश में तेरा लौट आना हल्की फुहार लगे


कुछ भूले थे तुम मुझे कुछ रूठी तुमसे मैं भी थी
गुज़श्ता रस्ता भी तेरे साथ मगर नवा आयाम लगे

कुछ अल्हड़ मैं भी थी कुछ बागी तो तुम भी थे
पर तेरा न मुड़के देखना ख़लिश जिगर के पार लगे


तुम इतने पास थे की तेरे जाने की तस्ववुर न की
अज़ब कि इक चेहरा आइने में मुझे तेरा रूख्सार लगे

सोच तुझे मुस्कान आया है लौट आओ बहार आया है
उम्र गुजर जाए इसी रह जो हकीकत है पर ख्वाब लगे

गुज़श्ता-बीता हुआ
नवा आयाम -नया विस्तार
बागी-बगावत करने वाला
रूख्सार -चेहरा

-डा. शफ़क़ रऊफ
अररिया (बिहार)

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