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मेरे अल्फाज़

है उल्फत जिसका नाम शफ़क़

shafaque rauf

123 कविताएं

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हैं फसाना-ए-अजाएब अनगिनत इस दुनिया में
हमें तो फ़क़त अपनी इक दास्तान लिखनी है

मैं किसी और सा बनूं कोई आसरा ही क्यों करें
मुझे तो मुझमें बस रही वो मैं खुशनुमा देखनी है

है रुहानी रिश्ता जिससे वो मर के आबाद रहेगा
धड़कनें कोह जन्नत में वो नज़र को क्या देखनी है

कोई उसकी तस्वीर पूछे तो मेरी पलकों का पता दे
वो पा ले वो ख़ुशी जो उसकी ख़ुशी में निहां रखी है

है उल्फत जिसका नाम शफ़क़ क्या अजीब सी शै है
लहर सी पास ख़ुशबूओं सी दूर कि हर जा ही मिली है


-डा. शफ़क़ रऊफ
अररिया (बिहार)


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