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मेरे अल्फाज़

नीलवर्ण की मौन पीड़ा

Seema Garg

46 कविताएं

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तुम्हीं कहो एे मानस मोर
इतनी पीड़ा क्यों सहते हो

मौन ही रहते, कुछ नहीं कहते,
करते क्यों नहीं मुखरित गान हो

नीलघटायें छाती हैं जब बूंदें बरसे
छूम ~ छमक ~ छम

बन करके तब तुम निरंजन नृत्य
करते झूम ~ झमक ~ झम

नीलवर्ण सतरंगे पाँखों को फैलाकर अदभु्द नाच नाचते हो
सृष्टि की सुन्दरता की इक झलक दिखलाते हो

संग ~ संग नाच उठती ये धरा प्रकृति भी हरषा जाती
मनभावन ये रूप तुम्हारा मन ~ उपवन सरसाते हो

पगतल पर यदि दृष्टि जाती नयनों से नीर बहाते हो
आँखों से उमडकर चुपचाप मन की पीडा कहते हो

मोरनी बन जीवन संगिनी उन अश्रुजल को पी लेती है
भरकर अन्तस में पीर तुम्हारी नवसृजन वह करती है

आह!, कितना पावन समर्पण तुम्हारा कितनी सुन्दर परिभाषा है
महावियोगी प्यारे मयूरा कितना सुन्दर स्नेह तुम्हारा कैसी ये अभिलाषा है

इसीलिए तो नटनागर ने शीश पे तुम्हें सजाया है
कितना पवित्र जीवन तेरा रसिया के मन को भाया है

कितना पावन प्रेम तुम्हारा, कितनी निर्मल प्रीति है
प्रेमदीप जलाकर मन में कितनी पावन भक्ति है

अमर ~ प्रेम ये तुम्हारा मधुमय अमिय ~ रस का सिंचन है
तेरे अमर ~ प्रेम को जग करता वंदन है

युगों ~ युगों तक जग पावन प्रेम की गाथा गायेगा
तेरा निर्मल प्रेम सृष्टि के जनमानस को उद्वेलित कर जायेगा.. |

- सीमा गर्ग

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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