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मेरे अल्फाज़

अपनी हिन्दी बोली

Savita Verma

58 कविताएं

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जन्म के साथ जो सुनी वो अपनी हिन्दी बोली थी...
मां ने जब दुलार कर प्यारी बिटिया बोली थी..

हिन्दी में ही लोरी गाकर मैया मुझको सुलाती थी
जब नींदिया रानी अंखियों से दूर दूर डोली थी ॥

'जन्मदिन की शुभकामनाएं' ही दादी कहती सदा..
हमें 'हैप्पी बर्थ डे' कभी नहीं वो बोली थी ॥

अ आ ई से ही हुई थी शुरू पढाई जी...
ए.बी.सी.डी. बचपन से तब दूर दूर होली थी ॥

मंगलागीत गूंजते सदा ही कानो में सुअवसर पर...
तीज हो सावन की या वो फागुन की होली थी ॥

हिन्दी गीत गाकर हुई थी बिदाई मायके से
साजन के घर जब चली अपनी डोली थी ॥

याद जब आती मायके की जाकर ससुराल में
हिन्दी में ही चिट्ठी सब हाल अपना बोली थी ॥

कहां तक बताये विशेषता अपनी मातृ भाषा की...
अंतिम समय में भी जिव्हा राम-नाम बोली थी ॥

.
-- सविता वर्मा "ग़ज़ल"


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