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"abhilasha"

मेरे अल्फाज़

अभिलाषा

Savita Verma

45 कविताएं

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कई दिन से
एक मधुर
कर्णप्रिय सी
गुनगुनाहट
कानो में मानों
रस घोल रही हो।
मशीन की तरह
झाड़ू-पोछा
करते हाथ…
और देखते ही देखते
बर्तनों पर भी ऐसे
चलते मानों
छूट जायेगी ट्रेन …
मन ही मन उसका
मुस्कुराते रहना
आजकल।
कुछ अजीब सा
अंदेशा मन में कर रहा
था।
में पूछती कि इससे
पहले कह उठी
वो…
नही आएगी कल से
काम पर…
मिल गया उसे
जो उसकी पूरी
कर सके हर अभिलाषा।
हर सपना जो वो
गुनगुना रही है
कई दिन से।
काम छोड़ने का दुःख
था मुझे।
फिर उसे भी हक है
अपनी हर अभिलाषा
पूरी करने का।
सिर्फ कामवाली ही नहीं
बनकर रहना उसे।
यही कहती थी
अक्सर..
खुश भी थी में
उसके लिये।
वो कामवाली के
नाम से आज़ाद
तो होगी अब..
यही सोचकर
दे दिये ……
कितने ही गिफ्ट
साड़ी,बर्तन
और उसकी महीने
भर की पगार।।

- सविता वर्मा "ग़ज़ल"

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