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मेरे अल्फाज़

तोहमत

Satyam Jha

8 कविताएं

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तू एक बार मिल तो सही
क्या पता मंज़िल-ए-हसरत हो जाऊँ 
चश्में से देखा तो होगा कई बार 
दिल की नज़र से देख तो सही मुझे
मैं भी खुली किताब हो जाऊँ 
तोहमतें तो लगायीं है बहुत दुनिया वालों ने 
तू हाल-ए-दिल ब्याँ तो कर
तेरे नाम के साथ ख़ूबसूरत इल्ज़ाम हो जाऊँ 

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