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मेरे अल्फाज़

मैं और मेरी तन्हाई

Satya prakash

40 कविताएं

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मैंने खुद बुन ली है,अपनी तन्हाई,
बातें की खुद से ही,कभी आंख भर आई,
जी खोल जिया मैं,अपनी ही तन्हाई।

दूर तक ख्वाबों की गुफा में खोता गया,
अनायास जागा कभी,जग कर भी सो गया,
उनके संग रंग बुने,सजनी के गीत सुने,
मैंने खुद बुन -----

दिल के दरिया में,नहाया जी खोल कर,
पी गया रस सारे सपनों के घोलकर,
उनको भी प्यार किया, दिल खोल खोल कर,
मैंने खुद बुन ----

बिछड़े मन मीत की भी याद आई,
जी खोल रोया मैं, देकर दुहाई,
कभी देखा सामने वह, खड़ी मुस्कराई,
अगले पल अकेला मैं, संग मेरी तन्हाई।

कोई भी रोक नहीं, हंस लो या रो लो,
डूब जाओ सपनों में, किसी के भी हो लो,
मुझको है भा गई सुस्मित तन्हाई,
जी खोल जिया मैं, अपनी तन्हाई।

- सत्यप्रकाश अवस्थी, पी डी नगर उन्नाव

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