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मेरे अल्फाज़

चलो अब आदमी बना जाए

SATISH KUMAR

1 कविता

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सच नहीं वो जिसे सुना जाए
सच नहीं वो जिसे लिखा जाए

आँख देखा भी झूठ होता है
कैसे ज़िंदा यहाँ रहा जाए

इस कदर तार-तार रिश्ते हैं
किसे अपना सगा कहा जाए

एक चेहरे पे कई चेहरे हैं
कैसे इन्सान को पढ़ा जाए

बन के बहुरूपिया रहे अब तक
चलो अब आदमी बना जाए

महंगाई बढ़ रही है, संबंध घट रहे हैं
वो हम से कट रहे हैं, हम उन से कट रहे हैं

इतिहास हो गए अब आँगन के खेल सारे
क्वार्टर के दायरे में, अब घर सिमट रहे हैं

महफिल सजी-सजी पर, सब कुछ बनावटी है
ये लोग संगणक के, ज्यादा निकट रहे हैं

कैसे सिखाएँ घर पर, बेटे को भाईचारा
जब आप-हम परस्पर, खेमों में बट रहे हैं

होली हो या दिवाली या ईद चाहे क्रिसमस
अब जश्न में भी जम कर बारूद फट रहे हैं

हम आदमी हैं या बस, कहने को आदमी हैं
जहाँ स्वार्थ से रहा है, वहीं पर लिपट रहे हैं....

सतीश कुमार श्रीवास्तव 'नैतिक'

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