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मेरे अल्फाज़

मिट रहा मानवता जग से देखकर रोना आता है

satish chandra

1 कविता

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सभी शोर मचाकर जोर-जोर से रोने लगते हैं
जगाकर जन्नतवासी को हमेशा सोने लगते हैं
सीखाया अपने बच्चों को दूर संस्कारों से रहना
मगर जब झटके लगते हैं तो खुद रोने लगते हैं
न पेट भर खाना मिलता है न रहती दूर बीमारी है
कमाई करने को दिन-रात खुद को खोना पढ़ता है
बनाया किसने यह कानून, गरीबी बढ़ती जाती है
देव ने भेजा है मजमून, पढ़कर रोना आता है
आगे बढ़ने के क्रम में रोज पग पीछे बढ़ाते हैं
मिट रहा मानवता जग से देखकर रोना आता है

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